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About US / क्षेत्र परिचय –  Sanghiji Jain Mandir, Sanganer, Jaipur (Rajasthan) – Take Me To Mandir

 

राजस्थान के प्राचीन नगरों में सांगानेर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है । सांगानेर की बसावट समतल भूमि पर है । जिसके तट पर सरस्वती नदी बहती थी ।

सांगानेर राजस्थान की राजधानी जयपुर शहर से 13 किलोमीटर दूर दक्षिण की ओर स्थित है । प्राचीन ग्रंथों में इसका नाम संग्रामपुर भी मिलता है । यह नाम चतुर्थकालीन राजाओं से जुड़ा हुआ है । सांगानेर के पास चम्पावती , चाकसू , तथकगढ एवं आम्रगढ़ के राज्य थे , जिन्हें सांगानेर की समृद्धि , वैभव एवं उन्नति होने से ईर्ष्या थी । इन राजाओं ने मिलकर स्वर्गपुरी की उपमा को प्राप्त इस नगर को तहस नहस कर दिया । इन आतातायी राजाओं के सैनिक इस आदिनाथ मंदिर को भी तहस नहस करने के लिए आगे बड़े लेकिन वे मंदिर की सीमा में प्रवेश भी नही कर सके , मानो उन्हें मंदिर के रक्षक देव ने कीलित कर दिया हो । आतातायी राजाओं ने अपनी भाव परिवर्तित करके आदिनाथ बाबा के दर्शन का भाव प्रकट किया तथा मंदिर में प्रवेश कर आदिनाथ बाबा को माथा टेका तथा क्षमा याचना करके संकल्प लिया कि इस मंदिर का सरंक्षण करेंगे तथा बचे हुए जैन श्रावकों को उन राजाओं ने अभयदान भी दिया ।

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आमेर राज्य के सीमा क्षेत्र के युद्ध मे विजयश्री राजकुमार सांगा के हाथ लगी । विजय के बाद राजकुमार सांगा आमेर की ओर चल पड़े । मार्ग में उन्हें सांगानेर की उजड़ी हुई बस्ती दिखाई पड़ी । यहां जैसे ही राजकुमार सांगा को भव्य शिखरों वाला जैन मंदिर दिखाई दिया , वह प्रसन्नता से भर गया । उसे लगा जैसे कि शिखरों पर लगी पताकाएं उसका अभिनंदन कर रही हों । उसने मंत्रियों से कहा कि मानो यह शिखरें मुझे बुला रही हों , मुझे वहां ले चलो । उसने देवाधिदेव आदिनाथ भगवान एवं पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन किये । बाबा के दर्शन से उसे अलौकिक शांति प्राप्त हुई । तदनुसार राजकुमार सांगा ने आमेर की गद्दी पर बैठते ही सबसे पहले इस बस्ती को सुंदर ढंग से बसाया । सांगानेर को पूर्वत सुंदर वैभव पुनः प्राप्त होना इन्ही अतिशय कारी आदिनाथ बाबा की महिमा ही है।

सांगानेर स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर संघी जी पूरे विश्व मे प्रसिद्ध है । मंदिर में विराजमान भगवान आदिनाथ की चतुर्थकालीन भव्य प्रतिमा के एवं नाव फण से शुशोभित भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के दर्शन करके प्रत्येक यात्री को अपूर्व आनंद मिलता है । यह मंदिर वास्तुकला का प्रतीक है । इसके गगन चुम्भी शिखर दूर से ही यात्रियों को आकर्षित कर लेते हैं और उनपर फहराती पताकाएं मंदिर का अहर्निश यशोगान करती हैं ।

यह मंदिर 7 मंजिल का है । जिसकी दो मंजिल ऊपर व पांच नीचे है । मध्य में यक्ष देव द्वारा रक्षित भूगर्भ स्थित प्राचीन जिन चैत्यालय विराजमान हैं वहां मात्रा बालयति दिगम्बर साधु ही अपनी साधना के बल पर प्रवेश कर सकते हैं । अन्य किसी ने भी वहां पर प्रवेश करने का साहस किया तो उसके दुष्परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं ।

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